लोमड़ी की नकली दोस्ती
एक घने जंगल में एक चालाक लोमड़ी रहती थी। उसका नाम था लल्ली। लल्ली अपनी चतुराई और मक्कारी के लिए पूरे जंगल में मशहूर थी। वह हमेशा दूसरों को बेवकूफ बनाकर अपना काम निकालती थी। जंगल के सभी जानवर उससे थोड़ा डरते थे, पर उसकी मीठी बातों में आकर कई बार उसकी दोस्ती के जाल में फंस भी जाते थे। लल्ली को अपनी इस आदत पर बड़ा गर्व था। वह सोचती, “मैं सबसे होशियार हूँ। कोई मुझसे आगे नहीं बढ़ सकता।”
उसी जंगल में एक मोटा-ताजा भालू रहता था, जिसका नाम था भोलू। भोलू बहुत सीधा-सादा और नेक दिल का था। उसे शहद से बहुत प्यार था और वह दिन-रात शहद की तलाश में जंगल में घूमता रहता था। एक बार भोलू को जंगल के बीचों-बीच एक बड़े पेड़ पर छत्ता दिखा। छत्ते से शहद की मधुर सुगंध आ रही थी। भोलू खुशी से पागल हो गया। उसने सोचा, “आज तो मेरी किस्मत चमक गई। इतना सारा शहद! इसे खाने में कितना मज़ा आएगा।”
लेकिन छत्ता ऊँचे पेड़ पर था और भोलू को पेड़ पर चढ़ना नहीं आता था। वह नीचे खड़ा होकर बस छत्ते को देखता रहा और लार टपकाता रहा। तभी वहाँ से लल्ली लोमड़ी गुज़री। उसने भोलू को उदास बैठे देखा और उसकी नज़र छत्ते पर पड़ी। लल्ली के दिमाग में तुरंत एक शरारती idea आया। वह भोलू के पास गई और अपनी मधुर आवाज़ में बोली, “अरे भोलू भाई, क्या बात है? तुम इतने परेशान क्यों हो?”
भोलू ने मासूमियत से कहा, “लल्ली बहन, देखो न, ऊपर वो छत्ता कितना बड़ा है। उसमें ढेर सारा शहद होगा, पर मैं उस तक पहुँच नहीं पा रहा। मुझे पेड़ पर चढ़ना नहीं आता।”
लल्ली ने मौके को भुनाने की सोची। उसने नकली हमदर्दी दिखाते हुए कहा, “अरे, इसमें परेशान होने की क्या बात है? हम दोनों दोस्त हैं न! मैं तुम्हारी मदद करूँगी। मुझे पेड़ पर चढ़ना आता है। मैं ऊपर जाकर छत्ता तोड़ दूँगी और हम शहद बाँट लेंगे।”
भोलू को लल्ली की बात पर भरोसा हो गया। उसने खुशी से कहा, “वाह लल्ली, तुम सच में मेरी अच्छी दोस्त हो। ठीक है, तुम ऊपर जाओ, मैं नीचे इंतज़ार करता हूँ।”
लल्ली तेज़ी से पेड़ पर चढ़ गई। ऊपर पहुँचकर उसने छत्ते को तोड़ा और शहद चाटना शुरू कर दिया। नीचे भोलू बेसब्री से इंतज़ार कर रहा था। उसने ऊपर देखकर पुकारा, “लल्ली, क्या हुआ? शहद नीचे भेजो न!”
लल्ली ने ऊपर से चिल्लाकर कहा, “अरे भोलू, यहाँ तो बहुत सारी मधुमक्खियाँ हैं। मैं उन्हें भगा रही हूँ। थोड़ा इंतज़ार करो।” यह कहकर वह और तेज़ी से शहद खाने लगी। उसने सोचा, “भोलू तो मूर्ख है। इसे कुछ पता नहीं चलेगा। मैं सारा शहद खा लूँगी और इसे कुछ बचा हुआ दे दूँगी।”
काफी देर तक भोलू नीचे इंतज़ार करता रहा। आखिरकार उसका सब्र टूट गया। उसने फिर पुकारा, “लल्ली, अब तो नीचे आ जाओ। कितना समय लगेगा?”
लल्ली का पेट अब शहद से भर चुका था। उसने सोचा कि अब भोलू को कुछ देना ही पड़ेगा, वरना वह शक करेगा। उसने छत्ते का एक छोटा-सा टुकड़ा, जिसमें ज़रा-सा शहद बचा था, नीचे फेंक दिया और बोली, “लो भोलू, ये रहा तुम्हारा हिस्सा। बाकी तो मधुमक्खियों ने उड़ा दिया।”
भोलू ने वो छोटा टुकड़ा उठाया और उदास हो गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि इतने बड़े छत्ते में इतना कम शहद कैसे बचा। लेकिन उसकी सीधी बुद्धि ने लल्ली की चाल को नहीं पकड़ा। वह चुपचाप वो टुकड़ा चाटने लगा। लल्ली नीचे उतरी और हँसते हुए बोली, “देखा भोलू, मैंने तुम्हारी कितनी मदद की। अब तो तुम्हें मेरी दोस्ती पर भरोसा हो गया होगा न?”
भोलू ने हल्के से सिर हिलाया, पर उसके मन में कुछ शक पैदा हो गया था। वह सोचने लगा, “क्या लल्ली ने सच कहा, या उसने मुझे बेवकूफ बनाया?”
कुछ दिन बाद, जंगल में एक और घटना हुई। एक नदी के किनारे एक मछुआरे ने मछलियाँ पकड़कर रखी थीं और वह पानी लेने चला गया। लल्ली ने दूर से मछलियाँ देखीं और उसका मुँह ललचाने लगा। वह फिर से भोलू के पास गई और बोली, “भोलू भाई, नदी किनारे ढेर सारी मछलियाँ पड़ी हैं। हम दोस्त हैं न, चलो बाँट लें।”
भोलू को पिछले शहद वाला किस्सा याद आया। इस बार उसने सोचा कि वह लल्ली की चाल को परखेगा। उसने कहा, “ठीक है लल्ली, पर इस बार मैं मछलियाँ लाऊँगा और तुम इंतज़ार करना।”
लल्ली को भोलू की बात पर हँसी आ गई। उसने सोचा, “ये मोटा भालू क्या चालाकी करेगा? ठीक है, इसे मौका दे देती हूँ।” वह नदी किनारे बैठ गई और भोलू मछलियाँ लेने गया। भोलू ने सारी मछलियाँ उठाईं और एक पेड़ के पीछे छिप गया। उसने दो-तीन मछलियाँ खा लीं और फिर लल्ली के पास लौटा। उसने सिर्फ एक छोटी मछली लल्ली को दी और बोला, “लल्ली बहन, बाकी मछलियाँ तो हवा में उड़ गईं। ये रही तुम्हारा हिस्सा।”
लल्ली को गुस्सा आ गया। उसने चिल्लाकर कहा, “भोलू, तुम झूठ बोल रहे हो! मछलियाँ उड़ती नहीं हैं। तुमने मुझे धोखा दिया।”
भोलू ने शांत स्वर में कहा, “लल्ली, जैसे तुमने शहद के साथ किया था, वैसे ही मैंने किया। दोस्ती में बराबरी होनी चाहिए न?”
लल्ली को अपनी गलती समझ आ गई। उसे एहसास हुआ कि उसकी नकली दोस्ती की वजह से आज वह खुद ठगी गई। उसने शर्मिंदगी से सिर झुकाया और बोली, “भोलू, मुझे माफ कर दो। मैंने तुम्हें बेवकूफ बनाया था। अब से मैं सचमुच की दोस्ती करूँगी।”
भोलू ने मुस्कुराते हुए कहा, “ठीक है लल्ली, पर याद रखो, दोस्ती में धोखा नहीं चलता। अगर हम सचमुच दोस्त बनें, तो हर चीज़ बराबर बाँटेंगे।”
उस दिन के बाद लल्ली ने अपनी चालाकी छोड़ दी और भोलू के साथ सच्ची दोस्ती निभाई। जंगल में सबने उनकी दोस्ती की मिसाल दी और यह बात फैल गई कि नकली दोस्ती ज्यादा दिन नहीं चलती।
नैतिक शिक्षा: दोस्ती में ईमानदारी और भरोसा सबसे ज़रूरी होता है। धोखे से बनी दोस्ती कभी सच्ची नहीं हो सकती।
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